अमेरिका चीन ताइवान युद्ध अमेरिका का वेनेजुएला पर अटैक: चीन की ताकत बढ़ी, ताइवान पर खतरा मंडराया! पूरी घटना, वजहें, चीन का रोल और नेक्स्ट क्या होगा की एक्सक्लूसिव एनालिसिस। ग्लोबल पॉलिटिक्स में बड़ा ट्विस्ट, वॉर का डर? लेटेस्ट अपडेट्स और एक्सपर्ट ओपिनियन यहां पढ़ें।

अमेरिका चीन ताइवान युद्ध अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला हाल ही में एक बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम है, जिसने चीन को उकसाया है और ताइवान पर खतरे को बढ़ा दिया है। इस घटना से वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। आइए इसकी गहराई से पड़ताल करें।
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले का पूरा सच
अमेरिकी सेनाओं ने वेनेजुएला की राजधानी में घुसकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अगवा कर लिया, जो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की मुनरो डॉक्ट्रिन पर आधारित कार्रवाई थी। यह डॉक्ट्रिन 19वीं सदी से लैटिन अमेरिका पर अमेरिकी वर्चस्व का प्रतीक रही है, जिसे ट्रंप ने संसाधन समृद्ध देशों पर दावा जताने के लिए इस्तेमाल किया। मादुरो की गिरफ्तारी से ठीक पहले चीन के विशेष दूत से उनकी मुलाकात हुई थी, जो अमेरिका के लिए संकेत था कि वेनेजुएला चीन का करीबी सहयोगी है।
इस हमले से अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल और बाजार पर कब्जा जमा लिया। ट्रंप प्रशासन ने शर्त रखी कि अब वेनेजुएला के बाजार में केवल अमेरिकी माल की सप्लाई होगी, जिससे चीन के हाथ से एक बड़ा आर्थिक बाजार निकल गया। वेनेजुएला अमेरिका के बाद चीन का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था, और पिछले साल 80% तेल निर्यात चीन जाता था। इसके अलावा, चीन का वेनेजुएला में 10 बिलियन डॉलर का लोन बकाया है।
चीन को लगा बड़ा झटका, सैटेलाइट और तकनीक पर खतरा
- #चीन को वेनेजुएला में अपने रणनीतिक निवेश का भारी नुकसान हुआ है।
- वहां चाइना ग्रेट वॉल इंडस्ट्री ने सैटेलाइट स्टेशन,
- रडार और एयर डिफेंस सिस्टम बनाए थे,
- जो चीन की निगरानी क्षमताओं का हिस्सा हैं।
- अमेरिकी पहुंच से ये संवेदनशील ठिकाने जोखिम में हैं,
- जिससे बीजिंग की तकनीकी श्रेष्ठता को चुनौती मिली।
- विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमला चीन के लिए आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर आघात है।
चीन ने राजनयिक मोर्चे पर जवाब दिया, अमेरिका पर अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन का आरोप लगाया, लेकिन सीधा टकराव टाला। फिर भी, यह घटना चीन को मजबूत तर्क देती है कि अगर अमेरिका लैटिन अमेरिका में दखल दे सकता है, तो चीन एशिया में अपनी दावेदारी क्यों न मजबूत करे।
ताइवान पर बढ़ा खतरा: चीन की ताकत में इजाफा
वेनेजुएला हमले ने चीन को ताइवान पर कार्रवाई का नैतिक और रणनीतिक आधार दिया। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि मुनरो डॉक्ट्रिन की तर्ज पर चीन ‘एकीकृत चीन’ नीति के नाम पर ताइवान पर कब्जा कर सकता है। चीन के पास अमेरिका से ज्यादा सैनिक, युद्धपोत, लड़ाकू विमान और परमाणु हथियार हैं, जो तेजी से बढ़ रहे हैं।
- अमेरिका, जापान और ताइवान सतर्क हैं।
- जापान ने योनागुनी द्वीपों पर सैन्य तैनाती बढ़ाई,
- जबकि अमेरिका-जापान ने ‘Resolute Dragon’ नामक अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त अभ्यास किया,
- जिसमें 20,000 सैनिक शामिल हुए।
- अमेरिका फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और गुआम में ठिकानों को तैयार कर रहा है।
- ताइवान ने रक्षा बजट GDP का 3.3% कर दिया,
- जो 2030 तक 5% होगा, और HIMARS, जैवलिन मिसाइलें मांग रहा है।
क्या होगा नेक्स्ट? संभावित परिदृश्य
- अगला कदम चीन का ताइवान पर सैन्य दबाव बढ़ाना हो सकता है,
- जैसे नौसेना अभ्यास या हवाई अतिक्रमण।
- अगर अमेरिका ने वेनेजुएला में सफलता दिखाई,
- तो चीन ताइवान को ‘संप्रभुता बहाली’ के नाम पर निशाना बना सकता है।
- जापान और अमेरिका की सतर्कता से युद्ध टल सकता है,
- लेकिन आर्थिक प्रतिबंध और साइबर हमले बढ़ेंगे।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा—तेल कीमतें चढ़ेंगी, सप्लाई चेन बाधित होगी। भारत जैसे देशों को तेल आयात में दिक्कत हो सकती है, लेकिन अमेरिकी बाजार खुलने से अवसर भी मिलेंगे। ट्रंप की आक्रामक नीति से यूरोप तक तनाव फैलेगा, जैसे ग्रीनलैंड पर दावा। कुल मिलाकर, दुनिया दो ध्रुवीय युद्ध की ओर बढ़ रही है।





